इस आत्मकथा के रचनाकार जे. के. दत्ता, अवसेवित अभियंता, बिहार सरकार, पथ निर्माण विभाग के पूर्व मुख्य अभियंता हैं। विश्व बैंक जैसी संस्था के साथ भी काफी लम्बे समय तक इनका जुड़ाव रहा है। वे इस क्षेत्र में पथनिर्माण के विकास तथा सरकारी विभागों की क्षमता निर्माण हेतु परामर्शी के रूप में भी अपना योगदान दिया। लेखक ने अन्तराष्ट्रीय श्रम संगठन ( ILO ) के बिहार, झारखंड के तकनीकी विभाग के तहत ग्राम पथ कार्यक्रम के तहत संवेदकों और अभियंताओं को प्रशिक्षित करने तथा प्रशिक्षण विस्तारीकरण का भी कार्य किया है। भारत सरकार एवं विश्व बैंक के संयुक्त समन्वय में भारत एवं ओरिएटेशन के बिच विभिन्न सड़क क्षेत्रों पर अन्वेषण, अनुसंधान और अन्तर सरकारी तथा अंतर संस्थाओं के प्रसाशन के तहत Indian Academy of Highway Engineer के अतिथि प्राध्यापक ( Guest Faculty ) के रूप में भी विभिन्न विभागों एवं प्रशिक्षण कार्यों का कार्य भी आपने किया गया। The Institution of Engineers ( India ) के बिहार संयुक्त के पूर्व उपाध्यक्ष के रूप में लेखक ने स्वतंत्र राज्य एवं बिहार सरकार द्वारा संयुक्त रूप से राज्य सड़क एवं अनुसंधान मूलक कार्यों का निर्माण तथा कार्यों का निरीक्षण किया। सेवानिवृत्त होने के उपरांत इन्होंने बिहार एवं झारखण्ड में स्वतंत्र परामर्शदाता के रूप में कार्य किया। इन्होंने अपने अनुभवों का आदान प्रदान जनसमूह में बोध कराने के उद्देश्य से इस पुस्तक का प्रकाशन किया है। बहुत कठिनाईयों के बाद यह पुस्तक लेखक के जीवन के उतार चढ़ाव एवं उनके जीवन अनुभवों पर आधारित है। यह पुस्तक लोगों को समाज के उत्थान हेतु जीवन में प्रेरक एवं प्रेरणास्पद प्रकरण प्रस्तुत करती है।
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