‘कल सूरज बनकर आऊँगा’ एक ऐसा काव्य-संग्रह है, जो निराशा के अंधकार में भी आशा का उजाला तलाशने का साहस करता है। यह संग्रह मनुष्य के भीतर चल रहे संघर्ष, टूटन, प्रतीक्षा और पुनर्निर्माण की भावनाओं को अत्यंत सहज, लेकिन प्रभावशाली शब्दों में अभिव्यक्त करता है। कविताएँ केवल भावनाओं का प्रवाह नहीं हैं, बल्कि वे जीवन को समझने और स्वीकार करने की एक संवेदनशील दृष्टि भी प्रदान करती हैं।
इस संग्रह की कविताओं में प्रेम, पीड़ा, सामाजिक यथार्थ, आत्मसंघर्ष और मानवीय विश्वास एक-दूसरे में घुलते हुए दिखाई देते हैं। कवि कहीं प्रश्न करता है, कहीं प्रतिरोध रचता है, तो कहीं टूटते हुए मन को यह विश्वास दिलाता है कि हर रात के बाद एक नया सूरज अवश्य उगता है। ‘कल सूरज बनकर आऊँगा’ शीर्षक स्वयं आश्वासन है—अपने आप से भी और समाज से भी।
भाषा सरल, प्रवाहमयी और मंचीय प्रभाव से युक्त है, जो पाठक को सहज ही अपनी ओर आकर्षित करती है। इन कविताओं में प्रतीक, बिंब और संवेदना का संतुलित प्रयोग देखने को मिलता है। यही कारण है कि यह संग्रह केवल पढ़ा ही नहीं जाता, बल्कि महसूस किया जाता है। कई कविताएँ पाठक को आत्मचिंतन के लिए विवश करती हैं, तो कई उसे आगे बढ़ने का संबल भी देती हैं।
इस काव्य-संग्रह की विशेषता यह है कि इसमें आशा को किसी कल्पनालोक में नहीं रखा गया है, बल्कि जीवन की वास्तविक कठिनाइयों के बीच स्थापित किया गया है। कवि का स्वर न तो उपदेशात्मक है और न ही पलायनवादी, बल्कि वह संघर्षरत मनुष्य के साथ खड़ा दिखाई देता है।
इस संग्रह के रचनाकार सुमनेश सुमन हिंदी काव्य मंचों के एक सशक्त एवं संवेदनशील कवि हैं। उन्होंने कविता को केवल काग़ज़ तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जीवंत प्रस्तुति और सामाजिक संवाद का माध्यम बनाया है। उनकी कविताएँ जीवन के अनुभवों से उपजी हुई हैं, इसलिए उनमें बनावट नहीं, बल्कि सच्चाई की ताप है।
‘कल सूरज बनकर आऊँगा’ उन पाठकों के लिए एक महत्वपूर्ण कृति है, जो कविता में केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि जीवन का सहारा, संघर्ष की आवाज़ और भविष्य की रोशनी तलाशते हैं। यह संग्रह विश्वास दिलाता है कि अँधेरा चाहे जितना गहरा हो—सूरज फिर भी उगता है।
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KAL SURAJ BANKAR AUNGA
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