मनुष्य, सदा से एक छुपी हुई वेदना का पिंड रहा है। वह झूठ और मान्यताओं में इतना जीता है कि उन्हीं को सत्य मानने लग जाता है। और अपने आप से बोला हुआ यही झूठ, उसके जीवन-भर के दर्द का कारण बन जाता है। वह सोचता है कि सबकुछ तो है मेरे पास, पर फिर भी मैं बैचेन क्यों हूँ? क्यों ये झूठे सुख, मुझे पूर्ण शांति नहीं दे पाते? यहाँ जितने भी मौज-मस्ती के साधन थे, सब आजमा लिए, पर फिर भी डर हमेशा बना ही रहता है! क्या यह जीवन, बस यूँ ही पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर, हारा हुआ बीत जाएगा? जो जनमानस, यह सवाल करने की क्षमता रखते हैं, उन्हीं के लिए फिर संभावना उठती है, इन दुःखों से मुक्त हो पाने की। जो व्यक्ति, अपने इस आंतरिक दर्द को पहचान कर इससे बाहर आने का प्रयास करता है, वही फिर पाता है कि कई रास्ते, इस दिशा में ले जाने हेतु तैयार हैं। जो भ्रमवश गलत चुन लेता है, फिर वो भ्रम ही माया बन जाती है। ऐसा एकमात्र दर्शन है, जिसमें सभी प्रश्नों के उत्तर निहित हैं, वह है वेदांत! अपने मूल दुःख से मुक्त होने की दिशा में, हमारे जीवन में जो भी दुःख हैं, वह सब, उसी एकमात्र दुःख से मुक्ति की राह पर न होने के ही प्रतिबिंब हैं। परंतु अज्ञानवश मनुष्य, हृदयविदारक दुःख का समाधान संसार में ढूंढता है। संसार केवल रणभूमि है, उस बीज रूपी संभावना को साकार करने की और शरीर है साधन। इसी साधन से सही रिश्ता रखकर, समझकर पता चल सकता है कि किस तरह हम उस एक कामना को पूरा करें, जिसके पूरा न होने के कारण यह सब क्षुद्र कामनाएँ और दुःख हैं। दुःख वास्तव में परिणाम है, अपनी मूल कामना को छोड़कर अन्यत्र कहीं और आस लगाने के कारण। पर हम सब यह जानने की चेष्टा तभी कर पाते हैं, जब इन झूठी कामनाओं से बार-बार धोखा खाते हैं। इस पुस्तक में मूलतः आपसे आग्रह है कि आप दर्शन का, अध्यात्म का, अपने दुःखों से मुक्ति का, प्रेम का वास्तविक अर्थ समझें, वरना जीवन तो बीत ही रहा है और जैसे-तैसे बीत ही जाएगा। पर जो लोग, इस जीवन को मूल्य देना चाहते हों और अपनी उच्चतम संभावना को पाना चाहते हों, अपने पहले कभी न अनावृत्त हुए बल को देखना चाहते हों, जो सदियों से यूँ ही चल रही मान्यताओं/व्यर्थ अंधविश्वासों को चुनौती देना चाहते हों और अंत में, जो कृष्ण/बुद्ध/दयानंद/विवेकानंद जैसे महापुरुषों की बताई बातों का सही अर्थ जानना चाहते हों, वे सभी आगे बढ़ें और पुस्तक में दिए गए सभी अध्याय क्रमवार अवश्य पढ़ें।
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JANIYE PHIR MANIYE
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