“एक वृहद ग्रंथ — सुंदरकांड” रामचरितमानस के सर्वाधिक लोकप्रिय और भावप्रधान कांड सुंदरकांड का ऐसा विस्तृत, सरल और सुबोध विवेचन है, जो पाठक को केवल पाठ नहीं कराता, बल्कि उसके अर्थ, भाव और आध्यात्मिक संदेश से गहराई से परिचित कराता है।
यह ग्रंथ सुंदरकांड के प्रत्येक प्रसंग को क्रमबद्ध रूप से सामान्य भाषा में समझाते हुए प्रस्तुत करता है, जिससे हर आयु वर्ग का पाठक—चाहे वह साधक हो, विद्यार्थी हो या सामान्य श्रद्धालु—आसानी से इसके भावार्थ और महत्व को आत्मसात कर सके।
लेखिका ने कठिन शास्त्रीय व्याख्या के स्थान पर सरल उदाहरणों, भावात्मक व्याख्या और जीवन से जुड़े संकेतों के माध्यम से सुंदरकांड को जनसुलभ बनाया है।
लेखिका परिचय
श्रीमती मीरा अग्रवाल ‘मीराबाई’ का जन्म हाथरस के एक प्रतिष्ठित जमींदार परिवार में स्व. श्रीनाथ अग्रवाल एवं स्व. श्रीमती सुशीला देवी के घर हुआ। साहित्यिक जगत में वे ‘मीराबाई’ के नाम से सुविख्यात हैं और अपनी बहुमुखी प्रतिभा के लिए जानी जाती हैं।
बचपन से ही साहित्य में गहरी रुचि रखने वाली मीरा जी ने छात्र जीवन में अनेक छात्रवृत्तियाँ एवं सम्मान प्राप्त किए। आपने आगरा विश्वविद्यालय से एम.एम. (अंग्रेज़ी साहित्य), हिंदी साहित्य, संस्कृत तथा बी.एड. की शिक्षा प्राप्त की।
शिक्षण एवं साहित्यिक दृष्टि
विवाह उपरांत पारिवारिक दायित्वों के कारण औपचारिक साहित्यिक सक्रियता सीमित रही, परंतु लेखन और अध्ययन की साधना निरंतर चलती रही। आपने डी.बी. कॉलेज, इंटर कॉलेज एवं दिल्ली पब्लिक स्कूल में अध्यापन कार्य किया। वर्तमान में भी आप घर पर बच्चों को शिक्षा प्रदान करते हुए लेखन में सक्रिय हैं।
धार्मिक वातावरण में पले-बढ़े होने के कारण आपकी रचनाओं में आध्यात्मिक चेतना, भक्ति और नैतिक मूल्यों की स्पष्ट छाप दिखाई देती है, जिसका उत्कृष्ट उदाहरण यह सुंदरकांड ग्रंथ है।
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