“दर्द-ए-ग़म” एक गीतिका-संग्रह है—अर्थात् हिंदी में ग़ज़ल की आत्मा को सुरक्षित रखते हुए रचित काव्य रूप। इस कृति में शेरों की कसावट, बहर की लय और भावों की तीव्रता वही है, जो ग़ज़ल की पहचान है, पर भाषा पूरी तरह हिंदी की आत्मीयता में ढली हुई है।
इस संग्रह की गीतिकाएँ प्रेम, विरह, पीड़ा, सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं को अत्यंत संक्षिप्त किंतु प्रभावशाली शब्दों में व्यक्त करती हैं। यहाँ दर्द केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि समाज, समय और व्यवस्था से उपजा सामूहिक अनुभव बनकर सामने आता है।
मंगल सिंह ‘मंगल’ ने ग़ज़ल की संरचना को बनाए रखते हुए उसे हिंदी गीतिका का रूप दिया है—जहाँ हर पंक्ति स्वतंत्र होकर भी एक समग्र भाव संसार रचती है। “दर्द-ए-ग़म” पाठक को पढ़ने के साथ-साथ महसूस करने का अनुभव देता है।
लेखक परिचय
वरिष्ठ साहित्यकार मंगल सिंह ‘मंगल’ का जन्म 01 जनवरी 1960 को गाँव आँजनी, जिला बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। आपके पिता स्व. श्री सरमन सिंह एवं माता स्व. श्रीमती भाग्यवती देवी रहे। आपकी धर्मपत्नी श्रीमती बीना सिंह ‘मंगल’ हैं।
आपने स्नातक तक शिक्षा प्राप्त की तथा उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग से सेवानिवृत्त होकर वर्तमान में स्वतंत्र लेखन में सक्रिय हैं।
साहित्यिक विधाएँ व पहचान
आप कविता, गीत, गीतिका (हिंदी ग़ज़ल), व्यंग्य, दोहा, क्षणिकाएँ, हाइकू, फाड़कू मुक्तिका, टप्पे, कुण्डलिया आदि अनेक विधाओं में सृजनरत हैं। ग़ज़ल को हिंदी भावभूमि में ढालने की आपकी क्षमता आपको समकालीन कवियों में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।
साहित्यिक सक्रियता
आपकी रचनाएँ देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं साझा संकलनों में प्रकाशित हो चुकी हैं। साथ ही आपने अनेक कवि सम्मेलनों, काव्य-गोष्ठियों एवं साहित्यिक आयोजनों में प्रभावशाली काव्यपाठ किया है।




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