13 अक्टूबर 1935 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद स्थित ग्राम बहजादका की पुण्यधरा पर जन्मे श्री कौशल कुमार, स्व. श्री अयोध्या प्रसाद जी के कुलदीपक हैं। जीवन के नव्वें दशक में पदार्पण कर चुके यह साधना-पथ के पथिक, आज भी शब्दों की लौ से समय के तम को चीरते हुए, चेतना के क्षितिज पर एक प्रखर आलोक की भाँति प्रकाशित हो रहे हैं।
आगरा विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त कर आपने सहकारिता विभाग में वर्षों तक ईमानदारी, निष्ठा और समर्पण से अपनी सेवाएँ दीं। किंतु हृदय की वीणा तो साहित्य के सुरों में ही गूंजती थी—एक ऐसा साहित्य, जो देशभक्ति की मिट्टी में पला-बढ़ा, और जिसकी पंक्तियाँ स्वतंत्रता संग्राम के अमर स्वप्नों से सिंचित हैं।
आपकी प्रथम प्रकाशित कृति “वीर भगत सिंह” केवल एक खंड काव्य नहीं, बल्कि आत्मा की गहराइयों से फूटा हुआ वह घोष था, जिसमें एक युग की पुकार, एक वीर की वाणी और एक राष्ट्र का स्वर समाहित था। यह काव्य अपने विषय, भाव और प्रवाह के लिए समीक्षकों और सुधी पाठकों के बीच विशेष रूप से प्रशंसित रहा।
अब आपकी नवीनतम कृति “शौर्य शिखर आज़ाद”—स्वराज्य की उसी उज्ज्वल मशाल को अगली पीढ़ी तक सौंपने का एक साहित्यिक यज्ञ है, जिसमें क्रांति की चिनगारियाँ, आत्मोत्सर्ग की गाथाएँ और राष्ट्रधर्म की अमर गूँज विद्यमान है।
कौशल कुमार जी का साहित्य केवल इतिहास की पुनरावृत्ति नहीं, वह स्मृति का सौंधा स्तंभ है; वह हमें यह स्मरण कराता है कि यह स्वतंत्रता केवल संघर्ष का परिणाम नहीं, अपितु संस्कारों, बलिदानों और अमिट स्वप्नों की परिणति है।







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