राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर डॉ. हरिओम पँवार ओज के पर्याय स्वरूप एक ऐसा नाम हैं जिनकी पैनी कलम से निकले तीखे व तीक्ष्ण शब्दों की धार से उनका हर वर्ग का पाठक, हर वर्ग का श्रोता अनायास ही उनसे अपने-अपने रिश्ते खोजने, जोड़ने तथा फिर उन्हें गढ़ने लगता है।
24 मई 1951 को ग्राम बुटैना ‘सिकन्दराबाद’ जिला बुलन्दशहर में स्व० श्रीमती हरप्यारी एवं स्व० चौधरी घनश्याम जी के घर में जन्मे, मेरठ कॉलिज में पढ़े व मुज़फ़्फ़रनगर व मेरठ को तथा फिर समस्त भारतवर्ष को अपना कार्यक्षेत्र बनाये रखने वाले बहत्तर बसन्त देख चुके डॉ. हरिओम पँवार हिन्दी काव्य-मंचो पर ओज के हिमालय के रूप में स्थापित एक ऐसा नाम हैं जो समस्त साहित्य प्रेमियों के हृदयों पर राज करता है। देश ही नही वरन् सम्पूर्ण विश्व के उन सभी काव्य मंचो पर जहाँ कहीं हिन्दी बोली व समझी जाती है वहाँ भूषण की ललकार व दिनकर की हुंकार के सम्वेत स्वर से कविता का शंखनाद करते रहे हैं।
डॉ. श्री हरिओम पँवार जी की पुस्तक ‘आँसू की आग’ अब हम सबके सामने है। उनकी प्रथम बहुचर्चित व बहुप्रशंसित पुस्तक ‘अग्निपथ के शिलालेख’ की आगामी यात्रा को दर्शाती तथा हम सबको उनकी साहित्यिक यात्रा के अगले पड़ाव की ओर ले जाती हुई यह पुस्तक है जो निश्चय ही उनके पाठकवर्ग को पसन्द आयेगी।







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